• Concept of Conference
  • Bharat, where the ray of civilization first dawned upon, is the country of boundless spirits and profound thought. Eternal thinking first revealed itself in full glory in India and the stream of Indian thoughts has flowed, crossing over the obstacles of space and time, and is still flowing into ocher nations of the globe. The great achievements and discoveries of ancient Bharat in the fields of science, mathemadcs, economics, language, culture, arts, music, architecture, mineralogy, surgery, astrology, ayurveda, yoga and philosophy have enlightened humanity across the world. The shiny glory of Bharat was wrapped over by the dark ages of slavery under invaders and colonial rule over a long period of rime. As fire remains intact under the cover of ashes, similarly, ancestral fire still remains latent in modern Indians and it is the Time to rejuvenate that internal intellect of Bharatiya masses. Swami Vivekanand refered to Kathopanishad saying "Arise, awake and stop not until the goal is achieved" to enthuse the Bhartiya masses. To remove the ashes of ignorance off glory, Guru Ghasidas Vishwavidyalya, in association with Bhartiya Shikshan Mandal, is organizing a three-day International Conference of researchers and intellectuals to unravel various aspects of rejuvenation of Bharat.

    It is Bharat which recognizes the entire nature as a single entity and the right to life for all living beings. The deep thinking of Bhartiya people established the concept of global village 'Vasudhaiv kutumbakam', the concept of democracy "Munde munde matir bhinna", the concept of co-existence 'Sarve bhawantu sukhinah', the concept of cooperation, 'Sah viryam karvavahe', the concept of sustainable development, 'Tain tyakten bhungjitha', the concept of supremacy of truth 'Satyamev jayate', and the concept of peace not only for human beings but for the whole universe ’Antariksha Shanti, ausadhayo shanti’ and many many more great ideas were propagated for humanity. Bharat is a land of great sages who have enlightened the path of mankind not only in Bharat but all over the globe. Bharat is the origin of great religions of the world and has also influenced the ideology of other religions. It is time to think why Bharat has lost its glorious past. The root cause of the diminution is the long period of slavery that adversely affected our inherent intellect, social order and harmony, and pushed the society into the darkness of ignorance.

    Inspite of being invaded many times and ruled by foreigners, ripped off its wealthy glory, having faced the partition and even after several other problems, standing firmly and rising high and high is the nation ’Bharat’. We have had great achievements after getting our independence. It is the largest democracy as well as world’s largest and oldest continuous civilization. Despite vast diversity in Bharat, it has always stood single and consolidated as one nation with high spirit and patriotic feeling. Science and technology have always been an integral part of Indian culture. Bharat is one of the four largest military powers in the world today with nuclear power capabilities. Science and technology of Bharat is growing with a great pace as is evident from various space programs including Lunar and Mars mission, GSLV- MK-III, and PSLV by lifting off 104 satellites together, Bharat is on the way to commercially launch satellites of developed nations at very low cost. Indian software skills and industry have proven our intellectual power all over the world. Today, Bharat is the fastest growing economy and has self sufficiency in food production and also exports various food grains. With the launch of ”Make in India", the country is growing self-reliant in manufacture and production of many indigenous goods/scientific equipments. The globe is feeling the upsurge of Bharat again. It is time to think who we are and what we are. The society must be aware of its continual intellect and cultural treasure so as to work hard to rejuvenate the glorious past. It is the time to reconsider and relaunch the idea behind the Bhartiya philosophy, its real strength and identity and to enthuse one and all born on Bharat Bhoomi with ”Utho Singh Putron" for rejuvenating Bharat. This vibrant conference will provide an opportunity to discuss thoroughly the various aspects of glorious past and present upsurge of Bharat to rejuvenate the society.



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  • भारत अनंत दार्शनिकता एवं गहन चितंन की वह भूमि है जहां सभ्यता की प्रथम किरण आलोकित हुई । शाश्वत सत्य का प्राकट्य पूर्ण आलोकित रूप में स्वतःस्फूर्त हुआ एवं भारतीय विचारों का यह प्रवाह देश एवं काल की सीमाओं के पार वसुधा के राष्ट्रों को अक्षुण्ण आप्लावित कर रहा है। प्राचीन भारत का विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, साहित्य एवं भाषा विज्ञान, कला एवं संस्कृति, नाट्य एवं संगीतकला, स्थापत्य कला, खनिज विज्ञान, आयुर्वेद एवं शल्यक्रिया, खगोल विज्ञान, योग एवं दर्शनशास्त्र की महान उपलब्धियों एवं अविष्कारों ने संपूर्ण में मानवता का पथ प्रदर्शित कर आत्म बोध कराया। दार्शनिकता एवं वैज्ञानिक विचारों के सतत् प्रवाह एवम् तेजस्विता को आक्रांताओं एवं औपनिवेशिक दासता के लम्बे काल खण्ड के अंधकार ने ढॅंक दिया । परन्तु जिस प्रकार अग्नि राख से परावृत होकर भी दीप्तिमान रहती है उसी प्रकार प्राचीन भारतीय चिंतन की ज्ञानाग्नि भारतीयों के अंतःकरण में सुप्त पड़ी हुई है और अब यह उचित समय है कि भारतीयों की सुप्त अतःप्रज्ञा एवं चेेतना का नवोन्मेष हो। स्वामी विवेकानन्द ने कठोपनिषद के शास्वत मंत्र ’’उत्तिष्ठः जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत‘‘ का बारम्बार उल्लेख भारतीयों की प्रेरणा के लिए किया। इसी परिपे्रक्ष्य में गुरू घासीदास विश्वविद्यालय और भारतीय शिक्षण मण्डल नवोन्मेष के विभिन्न पहलुओं पर मंथन के लिये तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन कर रहे हैं ।

    यह भारतीय चिंतन ही था जिसने सम्पूर्ण सृष्टि को एक इकाई के रूप में परिकल्पित किया एवम् सहअस्तित्व की भावना का प्रसार किया। भारतीयों की गहन विचारशीलता एवं मननशीलता ने वैश्विक परिवार की परिकल्पना ’वसुधैव कुटुम्बकम् ’, लोकतंत्र की परिकल्पना ’मुन्डे मुन्डे मतिर्भिन्नाः’, सहअस्तित्व एवं सर्वकल्याण की परिकल्पना ’सर्वे भवन्तुः सुखिनः’, सहयोग की परिकल्पना ’सह वीर्यम् करवावहै ’, चिरस्थायी विकास की परिकल्पना ’तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा ’, सत्य सर्वोपरि की परिकल्पना ’सत्यमेव जयते ’, और पूरे विश्व में शांति एवं सद्भाव की परिकल्पना ’अंतरिक्ष शांति ओषधयो शांति ’ एवं अनेकानेक उन्नत विचारों से मानवता का कल्याण किया। भारत की भूमि के महान दार्शनिक, वैज्ञानिक, विद्वान एवं चिकित्सक जो कि संत भी थे, ने सम्पूर्ण विश्व की मानवता को आलोकित किया। भारत विश्व के महानतम् धर्मों का उद्दगम है एवं अन्य सभी धर्मों के आदर्शों को प्रेरणा दी। दासता के लम्बे कालखण्ड से भारत की महानता एवं भारतीयों की अंतर्भूत विद्वत्ता, जीवन शक्ति, सामाजिक सद्भाव एवं व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई।

    अनेकों बार आक्रांताओं के आक्रमण और विदेशियों द्वारा शाशित होने पर भी, समृद्ध वैभव को खोने एवं विभाजन के बाद भी भारत एक ऐसा प्रबल राष्ट्र है जिसने उत्तरोत्तर प्रगति कर आत्मस्वाभिमान को बनाये रखा है । स्वतंत्रता के बाद भारत ने महान उपलब्धियां अर्जित की है । यह विश्व का सबसे बडा प्रजातंत्र होने के साथ-साथ सबसे प्राचीन प्रवाहमान सभ्यता है । अनेकानेक विविधता के बावजूद भारत राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होकर एक समर्थ एवम् संगठित राष्ट्र के रूप में स्थापित है । भारतीय संस्कृति के मूल में ही वैज्ञानिक चेतना विद्यमान है और वर्तमान में भी विज्ञान एवं तकनीकी का अद्भुत विकास हुआ है। भारत परमाणु क्षमता युक्त विश्व की चौथी बड़ी सैन्य शक्ति है। हमने अंतरिक्ष में चन्द्रयान एवम् मं गलयान के साथ ही GSLV-MK III एवं एक साथ 104 उपग्रहों का PSLV द्वारा सफल प्रक्षेपण किया है। आज भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गई है तथा खाद्यान्न में आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ इसका निर्यात भी करता है। भारतीय साॅफ्टवेयर प्रतिभा ने पूरे विश्व को चमत्कृृत कर दिया है। वर्तमान में हम विभिन्न वैज्ञानिक उपकरणों का निर्माण स्वदेशी तकनीक से कर रहे हैं। पूरा विश्व भारत के अभ्युदय को देख रहा हैं। यह उचित समय है कि हम आत्मचिंतन करे कि हम कौन हैं और क्या हैं ? भारतीय समाज को सतत् बौद्विकता एवम् सांस्कृृतिक विरासत का बोध होना चाहिये जिससे भारत की गौरवषाली वैभव को अथक पुरूषार्थ से पुनः प्रस्थापित कर सके। यही समय है जब भारतीय दर्शन एवम् अस्तित्व को पहचान कर सभी भारतियों में ’ उठो सिंह पुत्रों’ के उदघोष से उत्साह भर सकें । यह विशिष्ट सम्मेलन भारत के प्राचीन वैभव से वर्तमान अभ्युदय तक के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्ष कर नवोन्मेष का अवसर प्रदान करेगा।